शरद पवार को भरोसे लायक नहीं मानते थे बाल ठाकरे, लेकिन दोनों की दोस्ती थी मिसाल
शिवसेना और कांग्रेस में बढती दूरी का असर ठाकरे और पवार परिवार के रिश्तों पर नहीं पड़ा, हालांकि बाद में दोनों के रिश्ते कड़वे हो गये थे।
अक्टूबर 1966 की एक शाम शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे एक जनसभा में दहाड़ रहे थे, कार्टूनिस्ट से नेता बने बाल ठाकरे की ये पहली राजनीतिक रैली थी, मुंबई के शिवाजी पार्क में आयोजित इस रैली में वो देश के अलग-अलग हिस्सों से रोजगार की तलाश में मुंबई पहुंचे लोगों पर बरस रहे थे, उसी भीड़ में बैठा एक शख्स बाल ठाकरे को गौर से सुन रहा था, उस शख्स का नाम था शरद पवार, बारामती से कांग्रेस के कार्यकर्ता शरद पवार ठाकरे की सोच से सहमत नहीं थे, हालांकि वाईबी चव्हाण को राजनीतिक गुरु मानने वाले इस युवा कांग्रेसी को इतना पता था कि ठाकरे को हल्के में नहीं लिया जा सकता।राजनीति में आने से पहले मुलाकात
पवार-ठाकरे की मुलाकात शिवसेना के स्थापना से पहले ही हो चुकी थी, दरअसल बाल ठाकरे के पिता प्रबोधंकर एक सार्वजनिक शख्सियत थे, जिनके दादर स्थित आवास पर लोगों का आना-जाना लगा रहता था,
तब बाल ठाकरे के कार्टून लोगों को खूब लुभाया करते थे, फैक्ट्रियों और मिलों के शहर मुंबई पर कम्यूनिस्टों का दबदबा था, 1970 के दशक में कांग्रेस और शिवसेना के बीच तालमेल बनी, लेकिन शिवसेना की पहली रैली हुई, तो दोनों के बीच दरार पैदा हो गई।
राजनीतिक और पारिवारिक रिश्ते अलग
शिवसेना और कांग्रेस में बढती दूरी का असर ठाकरे और पवार परिवार के रिश्तों पर नहीं पड़ा, हालांकि बाद में दोनों के रिश्ते कड़वे हो गये थे,
लेकिन बाल ठाकरे के ना रह जाने के बाद शरद पवार ने उद्धव को मुख्यमंत्री बनवाने में बड़ी भूमिका निभाई, बाल ठाकरे की पहली रैली में ही शरद पवार को समझ में आ गया था, कि शिवसेना की सोच से असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बाल ठाकरे के मन में शरद की दोहरी छवि
शिवसेना संस्थापक शरद पवार को हमेशा शरद बाबू कहा करते थे, हालांकि अपने भाषणों में वो शरद पवारे के लिये मैद्याचा पोटा यानी आटे की बोरी का इस्तेमाल किया करते,
राजनीतिक मतभेद के बावजूद दोनों का परिवार एक साथ खाना खाया करता, और एक-दूसरे के दुख-सुख में भी शामिल होता, पवार ने एक बार बताया कि भोजन के बाद वो पुणे जिला स्थित अपने गृह नगर लौटना चाहते थे, ठाकरे ने उनसे रात भर रुक जाने की जिद की, क्योंकि सुप्रिया छोटी थी, और रात का सफर ठीक नहीं होता, लेकिन पवार नहीं माने, तो ठाकरे तब तक नहीं सोये, जब तक पवार ने उन्हें अपने घर पहुंचकर फोन पर जानकारी नहीं दी।
सुप्रिया के लिये बीजेपी को मनाया
शरद पवार ने 2006 में तय किया, कि उनकी बेटी सुप्रिया को राज्यसभा के लिये नामित किया जाएगा, तो बाला साहेब ने उन्हें किया और इस बात पर नाराजगी जाहिर की,
कि ये खबर उन्हें किसी दूसरे से मिली, पवार ने खुद उन्हें नहीं बताया, इस पर शरद पवार ने कहा कि सुप्रिया के लिये बीजेपी-शिवसेना का वोट पाने की कोई उपाय नहीं है, क्योंकि उनका अपना उम्मीदवार है, तो बाल ठाकरे ने बीजेपी से सुप्रिया के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं देने का कहा, ठाकरे ने पवार से कहा था कि मैं सुप्रिया को बचपन से जानता हूं, वो 6 महीने की की थी, तब से मेरे बच्चों के साथ खेली है, मैं ये कैसे देख सकता हूं, कि वो निर्विरोध राज्यसभा ना पहुंचे।
भरोसे लायक नहीं
हालांकि बाल ठाकरे के मन में शरद पवार के लिये दोहरी छवि थी, क्योंकि उनका मानना था कि वो दोस्ती के लिये ठीक है, लेकिन भरोसे के लायक आदमी नहीं है,
क्योंकि अपनी महत्वाकांक्षा के लिये वो दोस्ती की भी बलि चढा सकता है, इसलिये उससे दोस्ती सोच-समझकर कीजिए।




