पहले नीतीश कुमार को लुभाते रहे, जब मिला झन्नाटेदार जवाब, तो बदल गये कांग्रेस नेता के सुर
गुलाम नबी आजाद ने एक तरह से जदयू प्रमुख को खुला ऑफर दिया, लेकिन उऩकी कोशिशों पर तब पानी फिर गया, जब जदयू ने उनके बयान का स्वागत करने के बजाय उन पर हमला बोल दिया।
गुलाम नबी आजाद ने एक तरह से जदयू प्रमुख को खुला ऑफर दिया, लेकिन उऩकी कोशिशों पर तब पानी फिर गया, जब जदयू ने उनके बयान का स्वागत करने के बजाय उन पर हमला बोल दिया।
लोकसभा चुनाव के परिणाम से पहले ही देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी ने लगभग मान लिया है, कि उनके पास सरकार बनाने लायक आंकड़ा नहीं आने जा रहा है, दरअसल ये इसलिये कहा जा रहा है, क्योंकि सातवें चरण के मतदान से पहले ही कांग्रेस जोड़-तोड़ में जुट गई है, हालांकि यहां भी कांग्रेस अपने मंसूबों में कामयाब होती दिख नहीं रही है।गुलाम नबी आजाद का बयान
दरअसल 15 मई को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद पटना पहुंचे थे, वहां उन्होने कहा कि नीतीश कुमार कुछ मजबूरी की वजह से यूपीए छोड़ एनडीए में लगये,
गुलाब नबी के मुताबिक नीतीश जैसे कुछ और नेता हैं, जिनकी विचारधारा बीजेपी से नहीं मिलती, लेकिन सत्ता या फिर किसी और वजह से बीजेपी के साथ हैं, अगर इस बार बीजेपी सत्ता से दूर रही, तो गैर-मोदी सरकार के लिये ये सब कांग्रेस से साथ आ सकते हैं।
जदयू का पलटवार
हालांकि गुलाम नबी आजाद ने एक तरह से जदयू प्रमुख को खुला ऑफर दिया, लेकिन उऩकी कोशिशों पर तब पानी फिर गया, जब जदयू ने उनके बयान का स्वागत करने के बजाय उन पर हमला बोल दिया,
पूर्व सांसद और जदयू महासचिव के सी त्यागी ने कहा कि जदयू एनडीए का भरोसेमंद साथी है, मोदी जी हमारे सारथी हैं, और बीच युद्ध में सारथी नहीं बदले जाते, ये लोगों को समझना चाहिये, साथ ही त्यागी ने कहा कि गुलाम नबी आजाद जदयू के प्रवक्ता नहीं हैं, जो इस तरह की बातें कर रहे हैं, जदयू नेता ने दावा करते हुए कहा कि एक बार फिर मोदी की अगुवाई में सरकार बन रही है, और जदयू की भी उसमें हिस्सेदारी होगी।
बदल गये सुर
जदयू की ओर से करारा जवाब मिलने के बाद कांग्रेस नेता के भी सुर बदल गये, उन्होने अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा कि
ये सच नहीं है कि कांग्रेस सरकार बनाने का दावा नहीं करेगी, या पीएम पद के लिये इच्छुक नहीं है, 23 मई को देश की जनता सब साफ कर देगी, हम देश के सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी हैं।
पलटी मार चुके हैं नीतीश
आपको बता दें कि नीतीश अटल-आडवाणी युग में बीजेपी के सबसे भरोसेमंद साथी के तौर पर गिने जाते थे, लेकिन मोदी के आने के बाद वो बीजेपी का साथ छोड़ यूपीए में चले गये थे,
हालांकि बाद में नाटकीय तरीके से उनकी एनडीए में वापसी हुई, इस बार बिहार में जदयू और बीजेपी दोनों 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।



