खून की उल्टी होने के बावजूद मैदान पर डटे रहे युवराज, टीम इंडिया को बनाया था विश्व विजेता

खेल के प्रति युवराज सिंह की प्रतिबद्धता को इससे समझा जा सकता है, कि उन्होने अपनी तकलीफ को किनारे कर टीम की जरुरत का साथ दिया।

खेल के प्रति युवराज सिंह की प्रतिबद्धता को इससे समझा जा सकता है, कि उन्होने अपनी तकलीफ को किनारे कर टीम की जरुरत का साथ दिया।

1983 विश्वकप में कपिल देव की कप्तानी में टीम इंडिया ने पहला विश्वकप जीता था, इसके बाद टीम बड़े टूर्नामेंट जीतने के लिये तरस रही थी, तो इस सूखे को स्टार बल्लेबाज युवराज ने खत्म किया। पहले 2007 में टी-20 विश्वकप और फिर 2011 में आईसीसी विश्वकप, दोनों ही टूर्नामेंट में युवराज  ने शानदार खेल दिखाया, जिसके लिये उन्हें मैन ऑफ द टूर्नामेंट चुना गया।

संन्यास का ऐलान
मुंबई में प्रेस कांफ्रेंस  के जरिये संन्यास का ऐलान करते हुए युवी काफी भावुक दिखे,
उन्होने कहा कि 25 सालों तक 22 गज की पिच पर और करीब 17 साल इंटरनेशनल क्रिकेट खेलने के बाद अब आगे बढने का फैसला लिया है, उन्होने कहा कि क्रिकेट ने मुझे जीवन में बहुत कुछ सिखाया।

क्रिकेट को प्राथमिकता  
युवी ऐसे खिलाड़ी हैं, जिन्होने अपने करियर में हमेशा क्रिकेट को प्राथमिकता दी, हर मुश्किल दौर में टीम के लिये खड़े हुए, युवराज ने ऐसे समय में रिटायरमेंट की घोषणा की है,
जब टीम इंडिया इंग्लैंड में विश्वकप खेल रही है, हालांकि युवी इस टीम का हिस्सा नहीं हैं, युवी ने अपने करियर के प्रति जो प्रतिबद्धता दिखाई, वो दूसरे खिलाड़ियों के लिये मिसाल है।

खून की उल्टियां
विश्वकप 2011 में वेस्टइंडीज के साथ मैच से पहले उन्हें खून की उल्टियां हो रही थीं, इसके बावजूद वो मैदान पर डटे रहे और 113 रनों की यादगार पारी खेली,
जब युवराज बल्लेबाजी के लिये क्रीज पर आये थे, तो टीम का स्कोर 2 विकेट के नुकसान पर 51 रन था, युवी ने इस मुकाबले में शतक लगाया जिससे टीम तीन विकेट से जीतने में सफल रही, युवी को मैन ऑफ द मैच चुना गया था।

युवी की प्रतिबद्धता 
खेल के प्रति युवराज सिंह की प्रतिबद्धता को इससे समझा जा सकता है, कि उन्होने अपनी तकलीफ को किनारे कर टीम की जरुरत का साथ दिया,
आज भले युवराज क्रिकेट के मैदान से दूर हो गये हों, लेकिन उन्हें उनकी मैच जिताऊ पारियों के लिये हमेशा याद किया जाएगा।