एक वारंट ने बना दिया था मुख्यमंत्री, दिलचस्प है निर्दलीय विधायक से सीएम तक का सफर
2018 विधानसभा चुनाव से पहले वो गोंविदपुरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने को लेकर अड़े हुए थे, वो इस सीट से 10 बार विधायक रहे हैं, 11 बार भी इसी सीट से टिकट चाहते थे।
मध्य प्रदेश में 2003 विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने उमा भारती की अगुवाई में बड़ी जीत हासिल की, चुनाव के बाद उमा भारती प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, एक साल तो सबकुछ ठीक-ठाक चला, लेकिन अचानक फिर एक दिन 10 साल पुराने एक मामले में हालात ऐसे बन गये, कि उमा भारती को सीएम पद छोड़ना पड़ा, जिसके बाद बाबूलाल गौर को राज्य का नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया।दंगा भड़काने का आरोप
साल 1994 में कर्नाटक के हुबली में सांप्रदायिक दंगा भड़काने के आरोप में उमा भारती के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था, इसी मामले में उनके खिलाफ 2004 में गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ,
गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए बीजेपी हाईकमान ने उमा भारती को सीएम पद छोड़ने को कहा, उन्होने इस्तीफा देना पड़ा, उमा के इस्तीफा के बाद 74 वर्षीय बाबूलाल गौर को प्रदेश का नया सीएम बनाया गया, वो 23 अगस्त 2004 से 29 नवंबर 2005 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे।
यूपी में जन्म
बाबूलाल गौर का जन्म 2 जून 1930 को यूपी के प्रतापगढ जिले में हुआ था, फिर उन्होने भोपाल की पुट्ठा मिल में मजदूरी करते हुए अपनी पढाई पूरी की,
भेल में नौकरी करने के दौरान वो कई श्रमिक आंदोलनों से जुड़े, यहीं से उन्होने ट्रेड यूनियन राजनीति में अपनी जड़ें जमाई, वो भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे, स्कूली दिनों से ही बाबूलाल गौर आरएसएस से जुड़ गये थे।
निर्दलीय विधायक से सीएम तक
1974 में वो पहली बार भोपाल से निर्दलीय चुनाव जीते, यहीं से उन्होने राजनीतिक सफर की शुरुआत की, 1974 के बाद वो लगातार यहां से चुनाव जीतते रहे,
जून 2016 में पार्टी ने उनकी उम्र का हवाला देते हुए मंत्री पद छोड़ने का कहा, दरअसल बीजेपी ने 70 पार के नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी ना देने का फॉर्मूला तय किया था, जिसके बाद बाबूलाल गौर को भी मंत्री पद छोड़ना पड़ा, तब उन्होने शिवराज सरकार के खिलाफ बागी तेवर भी दिखाये थे।
बहू ने संभाली विरासत
2018 विधानसभा चुनाव से पहले वो गोंविदपुरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने को लेकर अड़े हुए थे, वो इस सीट से 10 बार विधायक रहे हैं,
11 बार भी इसी सीट से टिकट चाहते थे, जबकि बीजेपी उनके उम्र को देखते हुए उन्हें आराम देना चाहती थी, आखिरी क्षणों में पार्टी ने उनकी बहू कृष्णा गौर को इसी सीट से टिकट दिया, और बहू ने जीत हासिल कर अपने ससुर के सियासी विरासत को संभाल लिया। बाबूलाल गौर के आखिरी क्षणों में भी उनकी बहू उनकी सेवा करती रही।



